उत्तराखंड

औंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ में आज भव्य भैरव पूजा, कल केदारनाथ धाम के लिए रवाना होगी उत्सव डोली

आज औंकारेश्वर मंन्दिर ऊखीमठ में दिव्य और भब्य भैरवपूजा होगी कल पंच गद्दी स्थल ओंकारेश्वर मंदिर से डोली करेगी केदारपुरी के लिए प्रस्थान

हरीश चन्द्र ऊखीमठ ‌ ‌

इस बर्ष बारह ज्योतिर्लिंगों में श्रेष्ठ ग्याहरवें ज्योतिर्लिग हिमालय स्थित भगवान केदारनाथ के कपाट ग्रीष्मकाल के लिए शुभलग्नानुसार बिधिबिधान से 22 अप्रैल बुधबासरे तदनुसार 9 गते बैशाख मास को सुबह ठीक 8,00 बजे आम दर्शनार्थियों के दर्शन के लिए खोल दिए ‌जायेंगे, बर्षौं की परम्परानुसार हिमवत केदार बैराग्यपीठ के जगदगुरू 1008 श्री श्री श्री भीमाशंकर लिंग जी महांस्वामी जी कपाट का ताला खोलेगें।

इस अवसर पर सभी भक्तों को अखण्ड ज्योति के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा, छः माह तक विश्व प्रसिद्ध केदार ज्योतिर्लिग के दर्शनौ से लाखौं भक्तजन लाभान्वित होकर पुण्य के भागीदार बनेंगे, शीतकाल में भगवान केदारनाथ की छः माह शीतकालीन पूजा पंचकेदारों की गद्दी स्थली, ऊषा अनिरुद्ध की बिबाह स्थली, चक्रवर्ती सम्राट‌ राजा मान्धाता की तपस्थली,एवं बाईसमठौं की‌ गद्दी औंकारेश्वर मंन्दिर ऊखीमठ में होती है।

जब भगवान केदारनाथ जी की उत्सव डोली ऊखीमठ से केदारनाथ हिमालय के लिए गमन करती है तो ठीक एक दिन पहले औंकारेश्वर मंन्दिर में केदारनाथ जी के अंगरक्षक क्षेत्रपाल भैरवनाथ जी की भब्य पूजा अर्चना की‌ जाती है।

इस अवसर पर भैरवनाथ जी को स्वाले पकोड़ौ का भोग लगाया जाता है, और तब भैरवनाथ जी उसी रात्रि को केदारनाथ के लिए प्रस्थान करते हैं, भैरवनाथ जी की विशेष पूजा का अधिकार हजारौं बर्षौ की पूर्व परम्परानुसार जगदगुरू रावल जी महाराज को दिया गया है।

क्यों कि कहा गया है कि आदि गुरु शंकराचार्य जी ने जब हिन्दू धर्म की स्थापना की थी तो उसी समय महान तपस्वी ऐकोरामाराध्य महास्वामी‌ ‌ने बीरशैव धर्म की स्थापना कर‌ भारत में बीरशैव धर्मावलंबीयौं के पांच पीठों का निर्माण किया जिनमें दक्षिण में -श्रीशैल पीठ, और रम्भापुरी पीठ,उतर में उज्जैनी पीठ, कांशी पीठ और हिमालय में हिमवत केदार बैराग्यपीठ की स्थापना की थी‌।

उन्होंने इन पीठौ में जगदगुरू रावलौ की नियुक्ति कर पूजा अर्चना का अधिकार उन्हें सौंपा था‌ तब से हजारों बर्षौ‌ से ये परम्परा चलती आ रही है, ऐकोरामाराध्य महास्वामी‌ ‌ने पांचवें कठिन वैराग्य पीठ केदार पीठ में दक्षिण भारत के बिध्वान ब्रह्मचारी भुकुण्डलिंग‌ जी महाराज को इस पीठ के प्रथम जगदगुरू बना कर भेजा था।

ये महान तपस्वी और भैरवनाथ जी के घोर उपासक भी थे‌ कहा जाता है कि उन्होंने केदारनाथ में लम्बे समय तक भैरवनाथ जी की घोर उपासना की थी तब भैरवनाथ जी ने उन्हें दर्शन देकर आर्शीवाद दिया , तब से इस भैरव को भुकुंण्ड भैरव कहा जाने लगा, जो हर समय केदारनाथ जी के साथ रहते हैं चाहे केदारनाथ में हो‌ चाहे ऊखीमठ में हो क्योंकि जगदगुरू रावल जी महाराज को‌ बुलंदा केदार भी कहा जाता है इसलिए केदारनाथ धाम के लिए प्रस्थान करने के एक दिन पहले जब भैरव पूजा होती है तो परम्परा के अनुसार भुकुंण्डलिंग जी महाश्वामी के प्रतिनिधि के रूप में बर्तमान ‌में जो भी जगदगुरू रावल‌ होते हैं उन्हें ही आज की रात्रि पर‌ मुख्य रूप से ‌ भैरव पूजा का अधिकार सोंपा गया था।

पूजा से पहले भैरव जी को आटे से बने स्वाले(पूरी ) और उड़द के दाल की पकोड़ी का भोग लगाया जाता है, पूजा के बाद उसी समय भैरवनाथ जी केदार पुरी के लिए गमन करते हैं और जब तक केदारनाथ जी की उत्सव डोली केदारनाथ नहीं पहुंच पाती है तब तक भैरव केदारनाथ की व्यवस्था को देखते हैं।

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