उत्तराखंड

सेवारत एलटी शिक्षकों के हित में उत्तराखण्ड एलटी सेवा नियमावली में संशोधन पर गंभीरता से विचार करे सरकार

देहरादून।

सेवारत एलटी शिक्षकों के हित में उत्तराखण्ड एलटी सेवा नियमावली में संशोधन पर गंभीरता से विचार करे सरकार

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सेवारत शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता को यथावत रखते हुए 31 अगस्त, 2028 तक की अंतिम समय-सीमा निर्धारित किए जाने के पश्चात उत्तराखण्ड के एलटी संवर्ग के अनेक शिक्षकों के समक्ष सेवा सुरक्षा, पदोन्नति तथा भविष्य की संभावनाओं को लेकर गंभीर चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया है कि निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 (आरटीई अधिनियम) के अंतर्गत निर्धारित न्यूनतम शैक्षिक योग्यताओं का पालन किया जाना आवश्यक है तथा यह व्यवस्था बच्चों के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार से जुड़ी हुई है। न्यायालय द्वारा समय-सीमा विस्तार प्रदान करते हुए यह भी संकेत दिया गया है कि इसे अंतिम अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।

ऐसी स्थिति में उत्तराखण्ड सरकार को इस विषय के मूल कारणों तथा राज्य की विशिष्ट प्रशासनिक एवं शैक्षिक परिस्थितियों का गंभीर परीक्षण करना चाहिए।

यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि वर्तमान विवाद मुख्यतः उन शिक्षकों से संबंधित है जिनकी नियुक्तियाँ आरटीई अधिनियम एवं टीईटी व्यवस्था लागू होने से पूर्व हुई थीं। इन शिक्षकों ने अपनी नियुक्ति के समय प्रचलित समस्त वैधानिक अर्हताओं एवं चयन प्रक्रियाओं को पूर्ण करते हुए विधिवत नियुक्ति प्राप्त की थी। आरटीई अधिनियम लागू होने के पश्चात नियुक्त अधिकांश शिक्षक पहले से ही टीईटी अर्हता धारण करते हैं। इसलिए यह विषय सीमित संख्या के शिक्षकों से संबंधित होते हुए भी उनके संपूर्ण सेवा जीवन, पदोन्नति एवं करियर सुरक्षा से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है।

उत्तराखण्ड में प्रारम्भिक शिक्षा एवं माध्यमिक शिक्षा हेतु पृथक निदेशालय कार्यरत हैं। एलटी संवर्ग प्रशासनिक रूप से माध्यमिक शिक्षा निदेशालय के अधीन संचालित होता है तथा उसकी सेवा संरचना, पदोन्नति व्यवस्था एवं विभागीय नियंत्रण भी माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं। इसके बावजूद वर्तमान सेवा नियमावली में एलटी शिक्षकों को कक्षा 6 से 10 तक अध्यापन हेतु अधिकृत माना गया है।

फलस्वरूप एलटी संवर्ग आंशिक रूप से उन वैधानिक प्रावधानों के दायरे में भी आता है जो प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्तर के शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता से संबंधित हैं। जबकि व्यवहारिक रूप से एलटी संवर्ग का प्रशासनिक एवं शैक्षिक स्वरूप मुख्यतः माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था से संबद्ध है। यह परिस्थिति सेवा नियमावली और वास्तविक कार्यप्रणाली के मध्य एक ऐसी विसंगति की ओर संकेत करती है जिस पर गंभीर विचार अपेक्षित है।

यह विचारणीय है कि जब एलटी संवर्ग का प्रशासनिक नियंत्रण, सेवा प्रबंधन, पदोन्नति तंत्र एवं शैक्षिक दायित्व मुख्यतः माध्यमिक शिक्षा विभाग के अधीन हैं, तब क्या वर्तमान सेवा नियमावली उत्तराखण्ड की वास्तविक शैक्षिक एवं प्रशासनिक संरचना का पूर्णतः प्रतिनिधित्व करती है?

उपरोक्त परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए राज्य सरकार को एलटी सेवा नियमावली की व्यापक समीक्षा हेतु एक उच्चस्तरीय समिति गठित करनी चाहिए, जिसमें विधि विशेषज्ञों, शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों, कार्मिक विशेषज्ञों तथा शिक्षक प्रतिनिधियों को सम्मिलित किया जाए।

समिति निम्न बिंदुओं पर परीक्षण कर सकती है—

• एलटी संवर्ग की वर्तमान सेवा संरचना एवं नियमावली का परीक्षण।
• माध्यमिक शिक्षा निदेशालय के अधीन कार्यरत एलटी शिक्षकों के वास्तविक शैक्षणिक दायित्वों का अध्ययन।
• आरटीई पूर्व नियुक्त शिक्षकों की विशेष परिस्थितियों का विधिक परीक्षण।
• सेवा नियमावली में आवश्यक संशोधन की संभावनाओं का मूल्यांकन।
• सेवारत शिक्षकों के करियर संरक्षण एवं पदोन्नति के अवसरों को सुरक्षित रखने के उपाय।
• भविष्य में उत्पन्न होने वाले विधिक एवं प्रशासनिक विवादों की रोकथाम हेतु स्पष्ट संवर्गीय व्यवस्था का निर्धारण।

यदि विधिक परीक्षण में यह संभव पाया जाता है, तो राज्य सरकार को एलटी संवर्ग की सेवा नियमावली में आवश्यक संशोधन कर उसे उत्तराखण्ड की वर्तमान माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था एवं प्रशासनिक वास्तविकताओं के अनुरूप पुनर्संगठित करने पर भी विचार करना चाहिए।

यह निर्णय उत्तराखण्ड की विशिष्ट परिस्थितियों में एल टी शिक्षकों की पदोन्नति तथा सेवा सुरक्षा हेतु एक वैधानिक, प्रशासनिक एवं न्यायसंगत समाधान तलाशने का सार्थक प्रयास हो सकता है।

उत्तराखण्ड के हजारों एलटी शिक्षक अपनी नियुक्ति के समय निर्धारित समस्त वैधानिक योग्यताओं के आधार पर चयनित हुए तथा वर्षों से प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को अपनी सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं। ऐसे में राज्य सरकार का यह दायित्व है कि वह न्यायालय के निर्णय का सम्मान करते हुए भी शिक्षकों के वैध सेवा हितों, पदोन्नति के अवसरों तथा करियर सुरक्षा को ध्यान में रखकर युक्तिसंगत समाधान की दिशा में पहल करे।

आज आवश्यकता टकराव की नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहते हुए व्यावहारिक, वैधानिक एवं दूरदर्शी समाधान खोजने की है।

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