उत्तराखंड

RTI के जवाब में 77,115 पन्नों का हवाला, सूचना के बदले मांगे ₹1.54 लाख

RTI के जवाब में 77,115 पन्नों का हवाला, सूचना के बदले मांगे ₹1.54 लाख

विकास कार्यों, बजट और ऑडिट की जानकारी मांगने पर नगर पंचायत लालकुआं का जवाब; RTI कार्यकर्ता ने उठाए सवाल, अब प्रथम अपील की तैयारी

रिपोर्टर गौरव गुप्ता 

लालकुआं/नैनीताल
सूचना के अधिकार के तहत नगर पंचायत लालकुआं से विकास कार्यों, बजट और ऑडिट से संबंधित जानकारी मांगना एक आरटीआई कार्यकर्ता को खासा महंगा पड़ता दिखाई दे रहा है। नगर पंचायत लालकुआं के लोक सूचना अधिकारी/अधिशासी अधिकारी की ओर से दिनांक 03 सितंबर 2026 को भेजे गए पत्र में बताया गया है कि मांगी गई सूचना से संबंधित अभिलेख कुल 77,115 पृष्ठों में हैं और उनकी प्रतिलिपियां उपलब्ध कराने के लिए ₹2 प्रति पृष्ठ की दर से ₹1,54,230 जमा कराने होंगे।

पत्र में 77,115 पृष्ठों के लिए ₹1,54,230 की मांग की गई है, लेकिन आरटीआई आवेदक का आरोप है कि उन्हें प्रश्नवार अथवा बिंदुवार सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई। उनके मुताबिक एक पन्ने के पत्र में केवल बड़ी संख्या में अभिलेख होने और शुल्क जमा कराने की बात कह दी गई, जबकि मूल आरटीआई आवेदन में पूछे गए प्रत्येक बिंदु के सामने संबंधित सूचना क्या है, यह स्पष्ट नहीं किया गया।

“पहले बताइए, किस सवाल की कितनी सूचना है”
आरटीआई कार्यकर्ता का कहना है कि उन्होंने नगर पंचायत से विकास कार्यों की सूची, उनसे संबंधित बजट/व्यय तथा ऑडिट से जुड़ी जानकारी मांगी थी। ऐसे में लोक सूचना अधिकारी को कम से कम यह स्पष्ट करना चाहिए था कि किस बिंदु की सूचना कितने पृष्ठों में उपलब्ध है और 77,115 पृष्ठों की गणना किस आधार पर की गई है।

उनका कहना है कि यदि वास्तव में अभिलेखों की मात्रा इतनी अधिक है तो आवेदक को रिकॉर्ड का निरीक्षण कराने और उपलब्ध सूचना को व्यवस्थित तरीके से प्राप्त करने की प्रक्रिया बताई जा सकती थी। इसके बजाय सीधे ₹1.54 लाख जमा कराने का पत्र भेज दिया गया।

मूल आवेदन के साथ प्रश्नवार जवाब क्यों नहीं?
आरटीआई कार्यकर्ता ने यह भी सवाल उठाया है कि जवाब में उनके मूल सूचना आवेदन में पूछे गए सवालों को सामने रखकर प्रश्न संख्या 1, 2, 3 और आगे प्रत्येक बिंदु का अलग-अलग उत्तर नहीं दिया गया। उनका आरोप है कि इस तरह का सामान्य जवाब सूचना उपलब्ध कराने के बजाय आवेदक को भारी-भरकम शुल्क की ओर धकेलने जैसा है।

उन्होंने कहा कि सूचना मांगने वाले को यह जानने का अधिकार है कि उसके प्रत्येक प्रश्न पर विभाग के पास क्या रिकॉर्ड मौजूद है। यदि किसी बिंदु की सूचना उपलब्ध नहीं है तो उसका स्पष्ट कारण बताया जाना चाहिए और यदि रिकॉर्ड उपलब्ध है तो उसके स्वरूप तथा उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए।
“सूचना से बचने का प्रयास हुआ तो आयोग तक जाएंगे”

आरटीआई कार्यकर्ता ने कहा कि वह इस मामले में प्रथम अपील दाखिल करेंगे और आवश्यकता पड़ने पर उत्तराखंड सूचना आयोग तक मामला ले जाएंगे। उनका कहना है कि उनका उद्देश्य सरकारी रिकॉर्ड को सार्वजनिक कराना है, विशेषकर विकास कार्यों, बजट और ऑडिट से जुड़ी जानकारी को सामने लाना है।

उन्होंने कहा कि “77,115 पन्नों का हवाला देकर ₹1,54,230 मांगना अपने आप में गंभीर सवाल खड़े करता है। पहले बिंदुवार यह स्पष्ट किया जाए कि मैंने क्या-क्या सूचना मांगी थी और प्रत्येक बिंदु पर विभाग के पास क्या सूचना उपलब्ध है। सूचना लेकर ही रहूंगा और जरूरत पड़ी तो सूचना आयोग तक जाऊंगा।”

रजिस्ट्री से भेजे गए पत्र पर भी सवाल
आरटीआई कार्यकर्ता ने यह सवाल भी उठाया है कि सूचना के संबंध में केवल एक पन्ने का जवाब तैयार कर उसे रजिस्ट्री के माध्यम से भेजने में हुए सरकारी खर्च का औचित्य क्या था। उनका कहना है कि जब जवाब में मूल आरटीआई आवेदन के प्रश्नों का प्रश्नवार निस्तारण ही नहीं किया गया, तो विभाग को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि सूचना उपलब्ध कराने की प्रक्रिया किस प्रकार अपनाई गई।

अब मामला प्रथम अपील में पहुंचने की तैयारी में है। यदि अपीलीय अधिकारी से भी संतोषजनक एवं बिंदुवार सूचना नहीं मिलती है तो आरटीआई कार्यकर्ता ने सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाने की बात कही है।

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