उत्तराखंड

जैव विविधता संरक्षण एवं जैविक खेती में पारंगत हुई 100 महिलाएं

जैव विविधता संरक्षण एवं जैविक खेती में पारंगत हुई १०० महिलाएं, प्राप्त किया प्रमाण-पत्र

देहरादून: प्रसन्नता की बात है नवधान्य में प्रशिक्षित हो रही महिलायें देश के अलग-अलग क्षेत्रों में भोजन की जैव विविधता बचाने के लिए किसानों को जागरूक एवं प्रशिक्षित करेंगी. यह संस्था विगत ३० साल से जैव विविधता संरक्षण और बीज बचाने का जो कार्य महिलाओं के साथ मिलकर कर रही है वह अपने आप में मिसाल है.“ यह कहना था जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती मधु चौहान का. वह रामगढ़ स्थित नवधान्य जैव विविधता फार्म पर आयोजित दो-दिवसीय ‘’जैव विविधता संरक्षक, जैविक खेती प्रशिक्षक’’ कार्यक्रम के द्वितीय दिवस पर महिलाओं को संबोधित कर रहीं थी.

 

इस कार्यक्रम में उत्तराखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल की १०० महिला और २५ पुरुष किसानों ने प्रतिभाग किया. उड़ीसा, बंगाल और उत्तराखंड के विभिन्न गांवों से उपस्थित इन प्रशिक्षक किसानों के साथ जाने माने विशेषज्ञों ने वार्तालाप की. इसी क्रम में तोरिया एवं सरसों शोध निदेशालय, भरतपुर राजस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. धीरज सिंह ने किसानों से आह्वान किया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में मौसम के हिसाब से सरसों या अन्य तिलहनी फसलों की खेती को बढ़ावा दें. कि सही समय पर, स्वस्थ बीजों का चयनकर , उचित कृषि क्रियाँये अपनाकर भरपूर और गुणवत्तायुक्त उत्पादन लिया जा सकता है. कि हाल के दिनों में सरसों उत्पादन में किसानों को अच्छा मुनाफा हो रहा है और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सरसों का तेल उत्तम है.

 

पंतनगर विश्वविद्यालय से प्रोफेसर डॉ वीरसिंह ने किसानों के साथ जैव विविधता आधारित जैविक खेती एवं बीज संप्रभुता पर अनुभव साझा किये. कि वे १९८५ के दौर से नवधान्य आन्दोलन के साथ हैं. उन्होंने कहा, “सूर्य हमारी धरती पर ऊर्जा का मुख्य स्रोत है. वनस्पतियाँ प्रकाश-संस्लेषण के माध्यम से इस ऊर्जा को ग्रहण करती हैं. सूर्य से प्राप्त यह ऊर्जा हमें फसल और अन्न के रूप में प्राप्त होती हैं. कुलमिलाकर दुनियां में पेड़-पौधे और फसलों की जितनी अधिक विविधता फूलेगी –फलेगी इस धरती पर जीवन उतना ही खुशहाल रहेगा.

इस अवसर पर पर्यावरणविद एवं नवधान्य संस्था की निदेशक डॉ. वन्दना शिवा ने कार्यक्रम के बारे में जानकारी दी कि ये महिला किसान विगत एक वर्ष में नवधान्य के विशेषज्ञों द्वारा ’जैव विविधता संरक्षक’ एवं जैविक खेती प्रशिक्षक’’ के रूप में प्रशिक्षित की गई है. आज उन्हें यहाँ प्रमाण -पत्र प्रदान किया जा रहे हैं. डॉ शिवा का कहना था कि एक फसली और रासायनिक खेती की वजह से जहा धरती का स्वास्थ्य ख़राब हो रहा है।

वहीँ मानव स्वास्थ्य निरंतर गिरता जा रहा है और केंसर जैसी भायावह बीमारियों की चपेट में आ रहा है.’’ उन्होंने कहा कि दुनिया भर में रसायनों को बनाने वाली कंपनियां बिना जमींन की खेती और बिन फसलों के भोजन की बात से लोगों को गुमराह कर रहीं हैं. कि ये वैश्विक कंपनियां किसी भी कीमत पर अपने जहरीले रसायनों और फर्जी आहार (भोजन) को खेतों और घरों में खपाना चाहती हैं. सच्ची बात तो यह है कि ‘’ विषमुक्त खेती और जहरमुक्त भोजन’’ से ही हमारी धरती, हमारी जैव विविधता और हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहेगा.

 

कार्यक्रम के पहले दिन उपरोक्त विषय पर प्रशिक्षित महिलाओं ने अपना परिचय दिया और एक वर्ष की अवधि में सीखे गए कार्य को अधिकाधिक किसानों तक फ़ैलाने का संकल्प लिया ताकि जैविक खेती को बढ़ावा और जैव विविधता को संरक्षण मिले. इस अवसर पर उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, झारखण्ड और प्. बंगाल में कोऑर्डिनेटर भी उपस्थित रहे. कार्यक्रम का समन्वयन डॉ ऍम पी सिंह, डॉ प्रीती, भावना और चन्द्र शेखर भट्ट के साथ नवधान्य परिवार के सदस्यों ने किया.

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