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उत्तराखंड: कौन बनेगा प्रदेश अध्यक्ष और नेता विपक्ष? चर्चा में यह नाम

देहरादून:. एक तरफ प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौटी भारतीय जनता पार्टी के अंदर मुख्यमंत्री के चयन को लेकर माथापच्ची चल रही है तो दूसरी ओर, चुनाव में बुरी तरह हारी कांग्रेस में भी प्रदेश अध्यक्ष और नेता विपक्ष को लेकर जोड़-तोड़ शुरू हो गई है। उत्तराखंड कांग्रेस के तीन प्रमुख नेताओं में शुमार हरीश रावत, प्रीतम सिंह और गणेश गोदियाल में सिर्फ प्रीतम ही लगातार छठी बार विधायक चुनकर आए हैं।

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गोदियाल इसी हफ्ते प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे चुके हैं और पार्टी ने मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री अविनाश पांडे को उत्तराखंड में हार के पीछे की वजह जानने का ज़िम्मा सौंपा है। इधर, प्रीतम की राहुल गांधी से मुलाकात चर्चा में है। प्रीतम सिंह ने गुरुवार शाम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी से नई दिल्ली में मुलाकात की। प्रीतम सिंह का कहना है कि मुलाकात औपचारिक थी, जिसमें राज्य के राजनीतिक हालात पर चर्चा हुई।

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हालांकि सूत्र बताते हैं कि मुलाकात में चुनाव हारने के कारण और आगे की रणनीति क्या हो? इसे लेकर प्रीतम सिंह ने अपनी बात आलाकमान के सामने रखी. इधर सिंह बतौर नेता विपक्षी दल रहते हुए कांग्रेस में मज़बूती से खूंटा गाड़े हुए एक और कार्यकाल चाह रहे हैं, लेकिन उनको चुनौती मिली है कांग्रेस के धारचूला विधायक हरीश धामी से। धामी का कहना हैं जब बीजेपी युवा मुख्यमंत्री पर दांव खेल सकती है, तो कांग्रेस को चाहिए कि वह भी नेता विपक्ष जैसे पद पर किसी युवा को बैठाए।

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धामी, असल में हरीश रावत गुट के माने जाते हैं। यहां ये भी बताना ज़रूरी है कि कांग्रेस में हरीश रावत और प्रीतम सिंह के खेमे हैं और दोनों में ज़बरदस्त खींचतान दिखती रही है। नेता विपक्ष के पद पर धामी के दावा करने को हरीश रावत गुट की ललकार के तौर पर देखा जा रहा है। धामी ने खुलकर कहा है, ‘मैं सिर्फ वोट डालने के लिए लगातार विधायक नहीं चुना जा रहा हूं।
गोदियाल के इस्तीफे के बाद कांग्रेस नये अध्यक्ष के लिए नेता का चयन करेगी। कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए खटीमा से कार्यवाहक मुख्यमंत्री पुष्कर धामी को हराने वाले भुवन कापड़ी, दलित नेता यशपाल आर्य, प्रीतम सिंह, हरक सिंह रावत जैसे नेताओं का नाम चल रहा है। हालांकि पार्टी ट्राइड एंड टेस्टेड फॉर्मूले के साथ गढ़वाल और कुमाऊं अंचलों के बीच सामंजस्य बैठाएगी  यानी नेता प्रतिपक्ष का पद गढ़वाल नेता के हाथ आया तो प्रदेश अध्यक्ष कुमाऊ से चुना जाएगा।
इसके अलावा, जातिगत समीकरणों का भी बैलेंस रखा जाएगा यानी ब्राह्मण, दलित और राजपूत जाति के नेताओं के दावों को कसौटी पर तौला जाएगा। चुनाव के दौरान पार्टी के प्रचार का ज़िम्मा संभालने वाले हरीश रावत बेशक चुनाव हार गए हों और पार्टी के तमाम नेता उन पर हमले भी कर रहे हों, लेकिन इस तथ्य को दरकिनार नहीं किया जा सकता कि उनकी भूमिका पार्टी में अभी खत्म नहीं हुई। इसका मतलब यह हुआ की प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष के चयन से पहले उन्हें कॉन्फिडेंस में लिया जाएगा।

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