हुड्डा की राज्यसभा परीक्षा, पास हुए तो बल्ले बल्ले, चूक गए तो कल्ले कल्ले

सतीश नांदल ने दी टेंशन।
महेश कौशिक
दक्ष दर्पण समाचार सेवा
रोहतक।
हरियाणा की राजनीति कभी शांत नहीं रही। यहां सत्ता की राह सीधी कम और पेचीदा ज्यादा रही है। कभी दलबदल की आंधी चली, कभी क्रॉस वोटिंग ने पार्टी अनुशासन की धज्जियां उड़ाईं और कभी “पेन बदलने” जैसे किस्सों ने लोकतंत्र की गंभीरता को ही सवालों में खड़ा कर दिया। ऐसी ही राजनीतिक बिसात पर इस बार का राज्यसभा चुनाव एक बार फिर नई कहानी लिखने जा रहा है।
दो सीटों के लिए तीन उम्मीदवार मैदान में हैं—भाजपा के संजय भाटिया, निर्दलीय के रूप में भाजपा समर्थित सतीश नांदल, और कांग्रेस के उम्मीदवार कर्मबीर बौद्ध। संजय भाटिया की जीत लगभग तय मानी जा रही है, लेकिन असली सियासी जंग दूसरी सीट को लेकर है, जहां कांग्रेस ने कर्मबीर बौद्ध पर दांव लगाया है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कर्मबीर बौद्ध का नाम केवल हरियाणा की अंदरूनी राजनीति से नहीं आया, बल्कि उन्हें कांग्रेस नेतृत्व में खास तौर पर राहुल गाँधी की सिफारिश पर उम्मीदवार बनाया गया है। ऐसे में यह चुनाव केवल एक सीट का नहीं, बल्कि कांग्रेस संगठन और प्रदेश नेतृत्व की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गया है।
यह परीक्षा सबसे ज्यादा अगर किसी के लिए अहम है तो वह हैं हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हूडा। क्योंकि हरियाणा में कांग्रेस की राजनीति का केंद्र लंबे समय से हुड्डा परिवार ही रहा है। चुनाव से पहले भी उन पर कई आरोप लगे कि उन्होंने अपने मामलों को हल्का करवाने के लिए भाजपा से किसी तरह की “सेटिंग” की थी, लेकिन इन आरोपों की ठोस सच्चाई कभी सामने नहीं आई।
हालांकि चुनाव के बाद कुछ समय के लिए यह चर्चा जरूर रही कि राहुल गांधी हुड्डा परिवार से नाराज हैं। लेकिन हाल ही में हुड्डा निवास पर कांग्रेस नेताओं का लंच इस बात का संकेत दे गया कि हरियाणा में कांग्रेस की कमान अब भी हुड्डा के हाथों में ही है।
अब वही भरोसा इस राज्यसभा चुनाव में कसौटी पर है। राहुल गांधी ने कर्मबीर बौद्ध को मैदान में उतारकर उनकी जीत की जिम्मेदारी सीधे हुड्डा के कंधों पर रख दी है।
हरियाणा की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां चुनाव केवल आंकड़ों से नहीं जीते जाते, बल्कि चालों से जीते जाते हैं। ऐसे में भाजपा समर्थित सतीश नांदल का निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरना भी कई लोगों को एक रणनीतिक चाल ही लग रहा है।
यही कारण है कि यह चुनाव केवल एक सीट का नहीं, बल्कि सियासी प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। अगर कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट रखकर कर्मबीर बौद्ध को जीत दिला देती है, तो यह हुड्डा के नेतृत्व की बड़ी जीत मानी जाएगी। तब हरियाणा की राजनीति में उनके लिए “बल्ले बल्ले” का माहौल होगा—खुशियों और ताकत का संदेश।
लेकिन अगर कहीं एक भी चाल उलटी पड़ गई, अगर कोई वोट फिसल गया, तो वही राजनीति जो आज ताकत दिखती है, कल्ले कल्ले का सवाल बन जाएगी। तब यही चर्चा होगी कि हरियाणा में कांग्रेस का किला भी दरक सकता है। और तब राजनीति में हुड्डा के लिए “कल्ले” का दौर शुरू हो सकता है—अकेले पड़ जाने का दौर।
क्योंकि राजनीति का सबसे कठोर सच यही है—
नेता को बनाने में सालों लगते हैं,
लेकिन एक गलती ही उसे सियासत में अकेला कर देती है।


