लोकल फॉर वोकल के नारों के बीच लालकुआं में पैराशूट सियासत का तराना

लोकल फॉर वोकल के नारों के बीच लालकुआं में पैराशूट सियासत का तराना ।
रिपोर्टर गौरव गुप्ता।
लालकुआं। मंचों से ‘लोकल फॉर वोकल’ का शंखनाद, लेकिन टिकट की दौड़ में बाहरी चेहरों की आहट—यह विरोधाभास इन दिनों लालकुआं विधानसभा की सियासी चर्चा का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है। सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी जहां स्थानीय नेतृत्व को बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर कुछ नेता अपनी कर्मभूमि छोड़कर नई विधानसभा में दावेदारी ठोकने की तैयारी में हैं।
आगामी चुनावों से पहले लालकुआं विधानसभा में ‘पैराशूट प्रत्याशियों’ की संभावित एंट्री ने माहौल गरमा दिया है। वर्षों से क्षेत्र में सक्रिय स्थानीय कार्यकर्ताओं का सवाल है—क्या मेहनत, संघर्ष और संगठन के प्रति निष्ठा का कोई मोल नहीं?
सियासत की उड़ान या जमीन से दूरी?
लालकुआं कोई ऐसी जमीन नहीं जहाँ चुनावी मौसम में उतरकर भरोसा खरीदा जा सके। यहाँ जनता चेहरों से अधिक चरित्र और नारे से अधिक नीयत को परखती है।
जो नेता सालों से जनता के सुख-दुख में शामिल रहा, आंदोलनों में खड़ा दिखा, और क्षेत्र की समस्याओं पर आवाज उठाता रहा—जनता उसी को अपना मानती है। ऐसे में बाहर से आए दावेदार के लिए विश्वास की डोर बाँधना आसान नहीं।
‘लोकल फॉर वोकल’ की असली परीक्षा
‘लोकल फॉर वोकल’ केवल एक अभियान नहीं, बल्कि विचार की प्रतिबद्धता है। यदि टिकट वितरण में स्थानीय दावेदारों की अनदेखी होती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या नारा केवल मंचों तक सीमित है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गलत संदेश गया तो संगठनात्मक ऊर्जा पर असर पड़ सकता है।
जनता की अदालत में फैसला
लालकुआं का मतदाता अब पहले जैसा नहीं रहा। वह पूछता है—
“जब हमें जरूरत थी, तब आप कहाँ थे?”
“क्या आप हमारी मिट्टी की नब्ज पहचानते हैं?”
यह चुनाव केवल दलों की रणनीति नहीं, बल्कि सिद्धांत और सुविधा की लड़ाई भी होगा।
अब देखना यह है कि लालकुआं किसे चुनता है
जमीनी जड़ों से जुड़ा प्रतिनिधि, या चुनावी मौसम का पैराशूट सैलानी?



