
लालकुआं से मुकेश कुमार की रिपोर्ट : जिस उत्तराखण्ड राज्य की परिकल्पना पहाड़ों के विकास और पलायन को रोकने के लिए की गयी थी, वो परिकल्पना कभी धरातल पर ही नहीं उतर पाई, 21 सालों में भाजपा और कांग्रेस ने प्रदेश की सत्ता बारी बारी हासिल की, लेकिन राज्य बनाने के पीछे जो मंशा प्रदेश की जनता की छुपी हुई थी, वो कभी राजनीतिक दलों के निजी स्वार्थों के चलते पुरी ही नहीं हो पायी, बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं आज भी प्रदेश की जनता को सिर्फ राजनीतिक मंचों पर मिलती रही है, लेकिन 2022 का चुनावी दंगल किस ओर कर रहा है इशारे और युवा पीढी की क्यों बदल रही सोच, देखिये चुनावी माहौल के बीच जनता के मन की बात हमारी ये खास रिपोर्ट।
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-1- बड़े संघर्ष और आंदोलनों की नींव रख कर बने उत्तराखण्ड राज्य बनाने के पीछे जो सोच इस प्रदेश की जनता की थी, वो कभी धरातल पर उतर ही नहीं पायी, राज्य बनने के बाद भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक दलों ने इस प्रदेश की सत्ता पर राज किया, और घोटालों की बुनियाद खोदकर प्रदेश को गर्त में धकेल दिया, यही नहीं जिन बेरोजगारों को सत्तर प्रतिशत रोजगार प्रदेश में देने की योजना बनायी वो कभी पूरी नहीं हुई, बेरोजगारी बढी तो पलायन भी बढ़ गया, और प्रदेश का युवा दूसरे प्रदेशों में जाने को मजबूर हो गया।
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शिक्षा बदहाली का आलम ये रहा कि सरकारी स्कूल बंदी की कगार पर है, स्वास्थ्य व्यवस्था डॉक्टरों की कमी के चलते बदहाल है, यही नहीं नारों में बने ऊर्जा प्रदेश की जनता महंगी बिजली खरीदने को मजबूर है, बावजूद इसके भाजपा और कांग्रेस इस प्रदेश की जनता को 21 सालों से घोषणाओं से गुमराह कर रहे हैं, वहीं पहली बार चुनावी मैदान में आयी आम आदमी पार्टी ने जनता के दिलों को छूने वाले मुद्दे उठाकर एक बार फिर जनता को उसी उत्तराखण्ड का सपना दिखाया है, जो वास्तव में प्रदेश की जनता चाहती थी, आखिर क्या निकला जनता के मन की बात में आप खुद ही सुनिये।
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21 सालों का उत्तराखण्ड प्रदेश विकास के आयाम तो स्थापित नहीं कर पाया लेकिन मुख्यमंत्रियों के चेहरे बदलने में जरूर इस प्रदेश ने ख्याति प्राप्त कर ली, मात्र कांग्रेस की नारायण दत्त तिवारी सरकार ने इस प्रदेश में पांच सालों का कार्यकाल पूरा किया, जिसके बाद सत्ता हासिल करने वाली पार्टियों ने सिर्फ चेहरे बदल कर जनता को गुमराह किया और विकास के मुद्दों से प्रदेश की जनता को भटकाते रहे, जो उद्योग लगे भी वो भी बंद हो गये, और पर्यटन की जहां असीम सम्भावनाएं थी वो कभी विकसित ही नहीं हो पाये।
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उद्योग शून्य, बेरोजगारी चरम पर स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल और शिक्षा निजी हाथों में खेल रही, ये हाल है उत्तराखण्ड जैसे युवा प्रदेश का, जहां खुद के संसाधनों के बावजूद विकास की डोर कभी पैंग बडा ही नहीं पायी, और राजनैतिक दल सिर्फ चेहरों को सामने कर जनता को गुमराह करते रहे, ब्यूरोक्रेसी कभी हावी रही तो कभी राजनेता इतने हावी रहे की घोटालों की इमारत खड़ी कर दी, वहीं 2022 का बदलाव आखिर किसको ताज पहनता है ये तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन इस बार दो की नहीं तीन पार्टियों की रेस उत्तराखण्ड में कई समीकरण बिगाड़ सकती है।