उत्तराखंड

17 साल 7 महीने की उम्र में मिली शिक्षक की नौकरी, वर्षों बाद बर्खास्त; रिकवरी और अधिकारियों पर कार्रवाई की उठी मांग

कोटद्वार शिक्षक भर्ती घोटाला: 17 साल 7 महीने की उम्र में मिली नौकरी, अब सेवा से बर्खास्त; उत्तराखंड बेरोजगार संघ के अध्यक्ष राम कंडवाल बोले— पूरी रिकवरी हो, जिम्मेदार अधिकारियों पर भी हो कार्रवाई

कोटद्वार। राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय बालक नगर, कोटद्वार में नियुक्त शिक्षक नफीस अहमद को शिक्षा विभाग ने विभागीय जांच पूरी होने के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया है। जांच में पाया गया कि अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय वर्ष 1985 की शिक्षक भर्ती में आवेदन करते समय नफीस अहमद की उम्र निर्धारित मानकों से कम थी। भर्ती के समय उनकी आयु 17 वर्ष 7 माह 11 दिन थी, जबकि नियमानुसार न्यूनतम आयु 18 वर्ष होना आवश्यक था। इसके बावजूद उन्हें सरकारी सेवा मिल गई और उन्होंने वर्षों तक नौकरी की।

इस पूरे मामले को लेकर उत्तराखंड बेरोजगार संघ के अध्यक्ष राम कंडवाल ने कहा कि यह मामला केवल एक शिक्षक की बर्खास्तगी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था और भर्ती प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति ने नियमों के विपरीत सरकारी नौकरी प्राप्त की, उसने वर्षों तक सरकारी वेतन और अन्य सुविधाओं का लाभ उठाया। ऐसे में केवल बर्खास्त करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उससे सरकारी खजाने से लिए गए पूरे वेतन और अन्य लाभों की रिकवरी भी की जानी चाहिए और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।

राम कंडवाल ने कहा कि इस मामले का खुलासा उन्होंने भी किया था और लगातार इस प्रकरण को उठाकर कार्रवाई की मांग की थी। वहीं कोटद्वार के स्थानीय पार्षद ने भी शिक्षा विभाग को शिकायत भेजी थी, जिसके बाद विभागीय जांच शुरू हुई। विभाग ने जांच अधिकारी नियुक्त कर रिपोर्ट तैयार की और रिपोर्ट में आरोप सही पाए जाने के बाद शिक्षक को सेवा से बर्खास्त करने का आदेश जारी किया गया।

राम कंडवाल ने कहा कि सबसे हैरानी की बात यह है कि जिस शिक्षक की नियुक्ति ही नियमों के विपरीत पाई गई, उसी शिक्षक को वर्ष 2023 में प्रतिष्ठित ‘शैलेश मटियानी राज्य शैक्षिक पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया। उन्होंने कहा कि शैलेश मटियानी पुरस्कार शिक्षा जगत का अत्यंत प्रतिष्ठित सम्मान है, इसलिए यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने बिना पूरी जांच-पड़ताल के ऐसे व्यक्ति का चयन इस सम्मान के लिए कैसे कर दिया।

उन्होंने कहा कि जिन अधिकारियों और चयन समितियों ने ऐसे व्यक्ति को सम्मानित किया, उनकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। “जब किसी शिक्षक को राज्य का सर्वोच्च शैक्षिक सम्मान दिया जाता है, तो विभाग को यह भी देखना चाहिए कि वह व्यक्ति नियमों के अनुरूप नियुक्त हुआ था या नहीं। यदि नियुक्ति ही संदिग्ध थी, तो ऐसे सम्मान पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगते हैं।”

राम कंडवाल ने कहा कि सरकारी नौकरियां उत्तराखंड के युवाओं का अधिकार हैं। यदि कोई व्यक्ति नियमों को दरकिनार कर नौकरी हासिल करता है, तो वह हजारों योग्य बेरोजगार युवाओं के साथ अन्याय है। उन्होंने मांग की कि इस मामले में केवल बर्खास्तगी तक कार्रवाई सीमित न रखी जाए, बल्कि पूरे सेवा काल में लिए गए वेतन और अन्य वित्तीय लाभों की रिकवरी, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कड़े कदम उठाए जाएं।

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